शनिवार, 22 सितंबर 2012


भीड़ चली आती है नसिहात्दारों  की, हाथों मैं संग है\ , मुद्दों के समझ नहीं ,गफलत का रंग हैं \                अंधकार मन का छिपाते, चन्दन लगते है \बेचते हैं मशविरे खुद को रहनुमां बताते है \  थोपते हैं सोच अपनी औरों पर आदतन ,ऐसे भी बद दिमाग दुनिया  मैं चन्द हैं \ लाचार है  ये बिचारे  खुद, अपनी ही सोच के पिंजरों मे बंद हैं\पर्दों के हिमायती जानते है  ,पर्दों के  फायदे \पर्दों  की आड़ मैं वो , तोड़ते हैं  पर्दों के कायदे\ सत्यम शिवम् सुन्दरम से  सजा,  सर्जन  उत्सव का  रंग  है \शिवलिंग को पूजते हैं हम , शिव अपने संग हैं \. शांति दे प्रभु इन्हे भी ,बैठ सके   चैन  से घर ये भी \बने फिरते हैं ,फालतू खामेखाहं \, कामो  मैं जी लगायें अपने  , बेकार  औरों  की फिकरों  मैं  तंग हैं                                         पूनम चन्द्रिका त्यागी

रविवार, 5 अगस्त 2012

आओ  दोस्त इस महानगरीय जीवन मरुथल  में उग  आओ   
इस बंज़र शहर मे जिंदगी की उपस्थिति को दर्ज कराओ .......  पूनम चन्द्रिका त्यागी \\                  

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

बेबसी
खामोशी में सुकून तलाशना ,कितना व्यर्थ प्रयास है / ये चीखती खामोशियाँ बहरा करदेती है , इनमे प्रतिध्वनियाँ है तुम्हारे शब्द-की /बंदिशें हो जहाँ साँस -२ पर ,फ़िर भी उड़ जाता है मन /सलाखों के पार नीले आसमानों मे,कोहेरे की धुंदली चादर मे जहाँ हो चुकी हो शुरुआत अंत होने की /पूनम चन्द्रिका त्यागी

मंगलवार, 19 जून 2012

एक से दीखते सरे चहरे , मटमैली चादर ओढे चलते है काट दिए सभी तरु घनेरे ,तपती राहों मेअब इंसानी तलुए जलते है पूनम चन्द्रिका त्यागी

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