बुधवार, 21 जनवरी 2015

भीड़ चली आती है नसिहात्दारों की, हाथों मैं संग है\ , मुद्दों के समझ नहीं ,गफलत का रंग हैं \ अंधकार मन का छिपाते, चन्दन लगते है \बेचते हैं मशविरे खुद को रहनुमां बताते है \ थोपते हैं सोच अपनी औरों पर आदतन ,ऐसे भी बद दिमाग दुनिया मैं चन्द हैं \ लाचार है ये बिचारे खुद, अपनी ही सोच के पिंजरों मे बंद हैं\पर्दों के हिमायती जानते है ,पर्दों के फायदे \पर्दों की आड़ मैं वो , तोड़ते हैं पर्दों के कायदे\ सत्यम शिवम् सुन्दरम से सजा, सर्जन उत्सव का रंग है \शिवलिंग को पूजते हैं हम , शिव अपने संग हैं \. शांति दे प्रभु इन्हे भी ,बैठ सके चैन से घर ये भी \बने फिरते हैं ,फालतू खामेखाहं \, कामो मैं जी लगायें अपने , बेकार औरों की फिकरों मैं तंग हैं पूनम चन्द्रिका त्यागी

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