बुधवार, 21 जनवरी 2015

Poonam Chandrika Tyagi शांत झील मे तिरता पत्ता नीद सुखद सी सोता है , आते है जब बदल घिर घिर सारा अम्बर रोता है , उठती है जो लहर झील मे दर्प से वो इठलाती है जाऊँ अंतस मे सागर झूम झूम कर गाती है , झील मे स्थिर जल सतह को मंद पवन सिहरती है ,इस सिहरन की आहट उस पत्ते तक भी आती है ,विरहासिक्त आकुल मन पत्ता ,शरण झील की पाता है ,और दबी पानी की भाषा मे जलगीत झील का गाता है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मेरी ब्लॉग सूची

कुल पेज दृश्य


Powered By Blogger
Powered By Blogger

Translate

फ़ॉलोअर

यह ब्लॉग खोजें